Saturday, September 7, 2013

जाने इस युग की हवा में जहर कैसा आजकल









जाने इस युग की हवा में जहर कैसा आजकल 
दोस्ती में दोस्त बनकर छल रहा है आजकल 


दूसरों को दोष  देकर हम खुश हैं अपने आप  में 
सिलसिला यही बरसों से यारो चल रहा  है आजकल 


चीजो के सोदे तो मैंने पढ़े थे किताबों में 
पर जिस्म का व्यापार भी अब हो रहा है आजकल 


मिल जाती है परिंदों को मंजिल बस पंखो को हिलाने से 
पर बुराइयों पर वक्त जाया चल रहा है आजकल 


अजब सी कशमकश में मैंने जिंदिगी गुजारी है 
बेरुखी ज़माने की देख बस जल रहा हूँ आजकल 


गुरुर जब से हुआ उन्हें अपनी अदाओं का 
बचाके नजरें उनसे अब निकल रहा हु आजकल 


बहुत नाज था संगदिल तमन्ना की वफाई पर 
करतूतें बेवफाई की देख संभल रहा हु आजकल 



जाने इस युग की हवा में जहर कैसा आजकल 
दोस्ती में दोस्त बनकर छल रहा है आजकल 



                                                                                               अ जी त  सि ह