Wednesday, December 8, 2010

मेरा सच,और मेरा झूट

             मेरा  सच,और मेरा झूट 
jindgi जाने मुझे क्या सीखाना chahti  है 
fir  उन्ही वीरानो मे मुझे  क्यूँ ले जाना चाहती है

बड़ी मुदत से संभाले है ये होश मैंने
वही  बेहोशी का मंजर  जाने क्यूँ दीखाना  चाहती है
हर  तुफ्फां ने मुझे अजमाया है
tinke -tinke ने मेरा dil दुखाया है
उम्मीद का दीपक liye firta हूँ इस जहान में
ये हवा तू भी उसे बुझाना चाहती  है
jindgi जाने मुझे क्या सीखाना chahti  है
 fir  उन्ही वीरानो मे मुझे  क्यूँ ले जाना चाहती है

गुजरते वक्त के पन्नो को मैं पलटता हूँ
 अकेला  हूँ बहुत रो रो के खुद मे ही simat ता हूँ
बरीशे खुशियों की होती है वीरानो में
न जाने क्यूँ में इक बूँद को तरसता हूँ 
ये हवा मेरा साथ दे, 
मुझ पर भी बरसे कुछ एसी बरसात दे 
या बता दे तू भी मुझे े  आजमाना चाहती है 

jindagi   जाने मुझे क्या सीखाना chahti  हैfir  उन्ही वीरानो मे मुझे  क्यूँ ले जाना चाहती है

गुजर  रही रही है jindagi मेरे अकेलेपन 
भूल रहा हूँ सबकुछ अब मै भोलेपन में 
अब मै हस्ता  भी हूँ और भी मुस्कुराता हूँ 
हर इक मुसकुराहट  में अपने गम को छुपाता हूँ 

देखता हूँ  jindagi   तू मुझे  कैसे हराती है 
jindgi जाने मुझे क्या सीखाना chahti  है
fir  उन्ही वीरानो मे मुझे  क्यूँ ले जाना चाहती है
      fir  उन्ही वीरानो मे मुझे  क्यूँ ले जाना चाहती है
अजीत  (तमन्ना ) कुमार singh

Saturday, November 27, 2010

मेरा दुःख कुछ भी नहीं ......उसके आगे.....

    मेरा दुःख  कुछ भी नहीं ......उसके आगे.....

रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //
 कभी सोचता,कभी खोजता, दुनीया की भीड़ में
खुद को dundhta

सबसे milta हूँ मैं  सबको गले लगाता हूँ मैं
सब कुछ है पर खुद को सबसे  अकेला पाता हूँ मैं

रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //

सब  मुझसे कहते हैं,तुम बहुत मुस्कुराते हो
कोई तोह पूंछे इसमें  kitne गम दफनाते हो
kya kisi   मुस्कान के पीछे  इतना गम होता है
चुप चुप सबकुछ सहता है पर मन ही मन रोता है
सबकुछ होने पर भी ये मन kyunn रोता है
क्या सबकुछ milne वालों कोई भी कोई गम होता है
उठते बैठते जागते सोते यही सोचता हूँ मैं


रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //

पर  मैं तोह कुछ भी नहीं ये हरदम मुझको लगता है/
जब इक छोटा सा  झोले वाला बच्चा मुझको  dikhta है
गुटके,बीडी sigret ले लो हर बार  yahhi वो कहता है
हर इक गुटके के पाउच में  बस उसका बचपन bikata है//
क्या उसकी दुनीया होगी क्या उसका जीवन होगा
polic ने उसको पकड़ liya तो आज उसका क्या होगा
collage की और आते आते यही सोचता हूँ मैं 

रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //

वो बच्च मुझसे   े कहता है भइया गुटके ले लो / 
एक  के बदले आप तो  एक free मैं ले लो //
मै गुटके नहीं खाता ये मैं उससे कहता हूँ /
दुःख तो होता है पर मै चुप चुप सा रहता  हूँ //
दुःख थे इतने उसको पर आँखों मे न नमी थी 
सुन्दर है चेहरा बस कपड़ों की कमी थी //
क्यूँ मैं कुछ नहीं कर पाता चुप क्यूँ रहता हूँ मैं 
collage की और आते आते यही सोचता हूँ मैं 

रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //

इक  din मुझको mile इक सज्जन उन्नने मुझे बताया 
इसकी माँ ने भी एसे ही train मैं जीवन bitaya 
पापा के गुजरे तोह जाने सालों बीत चुके हैं 
मम्मी के भी लगता है din पूरे हो चुके हैं 
कई dino से इसकी माँ बीमार पड़ गई है 
ये इसकी मजबूरी है या भूख बढ गई है 
ये इक छोटा सा बच्चा जाने  कीतने गम सहता है
सब  कुछ सहता है पर dinbhar हँसता रहता है
 मैं भी न जाने पल पल क्या dundhta रहता हूँ 
सब कुछ है fir भी मैं क्यूँ चुप चुप सा रहता हूँ 

जहाँ सीखने को milta है , वहीँ सीखता हु मैं 
रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //
                                                               :अजीत (तमन्ना) कुमार singh

Tuesday, November 9, 2010

अजीत की तमन्ना

         अजीत की तमन्ना

मेरी तमन्ना है कि वोही प्यार हो जाये,
school के वोही दो - चार यार हो जायें ||

नहीं अच्छा लगता ये college का दौर मुझे,
नहीं अच्छा लगता ये girlfriend का शोर मुझे |
फिर वोही टिफिन का पराठा आचार हो जाये ||

मेरी तमन्ना है कि वोही प्यार हो जाये,
school के वोही दो - चार यार हो जायें ||

वो बस से जाना और बम्बईया खाना,
वो बैर की गुठली से सबको सताना |
वो शैली का देखना, वो शुभ्रा का चिढ़ाना,
वो दिन याद करके मन ही मन मुस्कुराना ||

प्रकाश की बाते, तमन्ना से दिल लगाना,
सौरभ की सादगी, मयूर का guitar बजाना |
अजय का भोलापन, निधि के नखरे,
sister की बातें, निहारिका की कसमे |
picnic की बस में ये सब एक बार हो जाये ||

मेरी तमन्ना है कि वोही प्यार हो जाये,
school के वोही दो - चार यार हो जायें ||

नहीं अच्छा लगता ये college का दौर मुझे,
हर period अब तो लगता है बोर मुझे |
एक बार फिर class में जमकर शोर हो जाये ||

मेरी तमन्ना है कि वोही प्यार हो जाये,
school के वोही दो - चार यार हो जायें ||

प्रकाश का समझाना, वो शैली से रूठ जाना,
वो parents meeting से मन ही मंब घबराना |
वो पापा का आना, मेरा maths में फेल हो जाना,
पापा को देखकर मेरा मन ही मन शर्माना |
वो दोस्तों का दिलासा, वो शैली की help ,
एक बार फिर उन्ही राहों पर दोस्तों का इंतजार हो जाये

मेरी तमन्ना है कि वोही प्यार हो जाये,
school के वोही दो - चार यार हो जायें ||

नहीं अच्छा लगता ये success का शोर मुझे,
नहीं अच्छी लगती ये पैसों की होड़ मुझे |
बिना किसी शर्त के सब कुछ हार जाऊ,
आज फिर कोई ऐसी बात हो जाये ||

मेरी तमन्ना है कि वोही प्यार हो जाये,
school के वोही दो - चार यार हो जायें ||

वो college के सपने, ज़िन्दगी के नए कदम,
वो विदाई का वक़्त, कुछ ख़ुशी और गम |
चेहरे की मुस्कराहट, और आंखे थी नम,
वो मिलने के वादे, वो बिछड़ने का गम ||

अजीत आज भी वो सब याद करके रोता हैं,
क्या दोस्तों तुम्हे भी ऐसा ही feel होता हैं |

प्रकाश का मुझे देखना, शैली का आंसू छुपाना,
सौरभ का कुछ न कहना, बस दिल तोड़ जाना |
निहारिका के आंसू, शुभ्रा का मुस्कुराना,
वो निधि का इस गम में बेहोश हो जाना |
मेरे कंधे पे हाथ रखके, sister का चुप हो जाना,
ऐसे माहोल में भी मयूर का guitar बजाना ||

कुछ नहीं बदला बस बदल गए हम,
कहाँ थे कहाँ आ गए हम ?
आज फिर दोस्ती का किस्सा आम हो जाये ||

मेरी तमन्ना है कि वोही प्यार हो जाये,
school के वोही दो - चार यार हो जायें ||

इन दोस्तों को याद करके अजीत को आंसू बहाना है,
आँखे बंद करके बस सक्सेस की ओर भागते जाना हैं |
कहाँ मेरी मंजिल, कहाँ उनका ठिकाना है,
कभी मेरी है मज़बूरी, कभी उनका बहाना हैं |
तुम कितना भी आगे चले जाओ मेरे दोस्तों,
अजीत आज भी पुराना है, 
अजीत आज भी पुराना है .
" रुला दिया न यारों ..."
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       - अजीत  कुमार सिंह

तमन्ना काश तुम मेरे स्कूल में होती...

तमन्ना काश तुम मेरे स्कूल में होती...


तमन्ना काश तुम मेरे स्कूल में होती,
हरदम और हरपल मेरे साथ होती |
तुम रूठ जाती मैं तुमको मनाता,
रूठने मनाने मैं दिन गुजर जाता ||


बस से उतरता, देख तुम्हे खुश हो जाता,
तुमसे नजरे मिलती तो मन ही मन शर्माता |
तुम जहा होती वहा दौड़ कर आता,
पर दिल की बात तुमसे कभी न कह पाता ||


दिल ही दिल में बस ये सोच आती,
तमन्ना काश तुम मेरे स्कूल में होती,
हरदम और हरपल मेरे साथ होती ||


वो principal की  बाते, वो prayer की लाइन,
तुम्हे छुपकर देखना, और कहना you are mine |
हरपल हरदम मैं तुमको चिढ़ाता,
तुम्हे रोता देख, मैं चुप न हो पता |


तुम्हे कोई देखे तो मैं गुस्सा हो जाता,
हर बात पर उससे मैं यूँही झगड़ जाता ||
मेरी परेशानियों में तुम भी दुखी होती,


तमन्ना काश तुम मेरे स्कूल में होती,
हरदम और हरपल मेरे साथ होती |


वो लंच का समय, वो बेडमिन्टन का खेल,
खेल ही खेल में वो दिलो का मेल |
तुम्हारी ख़ुशी के लिए मैं हार जाता,
तुम्हे खुश देखके मैं भी मुस्कुराता |
तुम्हारी छोटी पकड़कर मैं तुमको रुलाता,
तुम्हे रोता देख मैं थोडा सा दर जाता |
दिल के इस पतंग की डोर तुम्हारी होती,


तमन्ना काश तुम मेरे स्कूल में होती,
हरदम और हरपल मेरे साथ होती |


वो छुट्टी का समय, वो बिछड़ने का गम,
दिल तो होता खुश, पर आँखे होती नम |
एक दिन और बिना कुछ कहे गुजर जाता,
काश अजीत तुमको सब कुछ बता पता |
इन्ही सब बातो का गम मुझे सताता,
पर सक्सेस की चाहत में, मैं सब कुछ भूल जाता |


इन रोती आँखों मे तूम सब कुछ पढ़ लेती,
तमन्ना काश तुम मेरे स्कूल में होती,
हरदम और हरपल मेरे साथ होती ||
© All rights are reserved.

       - अजीत  कुमार सिंह