Wednesday, December 8, 2010

मेरा सच,और मेरा झूट

             मेरा  सच,और मेरा झूट 
jindgi जाने मुझे क्या सीखाना chahti  है 
fir  उन्ही वीरानो मे मुझे  क्यूँ ले जाना चाहती है

बड़ी मुदत से संभाले है ये होश मैंने
वही  बेहोशी का मंजर  जाने क्यूँ दीखाना  चाहती है
हर  तुफ्फां ने मुझे अजमाया है
tinke -tinke ने मेरा dil दुखाया है
उम्मीद का दीपक liye firta हूँ इस जहान में
ये हवा तू भी उसे बुझाना चाहती  है
jindgi जाने मुझे क्या सीखाना chahti  है
 fir  उन्ही वीरानो मे मुझे  क्यूँ ले जाना चाहती है

गुजरते वक्त के पन्नो को मैं पलटता हूँ
 अकेला  हूँ बहुत रो रो के खुद मे ही simat ता हूँ
बरीशे खुशियों की होती है वीरानो में
न जाने क्यूँ में इक बूँद को तरसता हूँ 
ये हवा मेरा साथ दे, 
मुझ पर भी बरसे कुछ एसी बरसात दे 
या बता दे तू भी मुझे े  आजमाना चाहती है 

jindagi   जाने मुझे क्या सीखाना chahti  हैfir  उन्ही वीरानो मे मुझे  क्यूँ ले जाना चाहती है

गुजर  रही रही है jindagi मेरे अकेलेपन 
भूल रहा हूँ सबकुछ अब मै भोलेपन में 
अब मै हस्ता  भी हूँ और भी मुस्कुराता हूँ 
हर इक मुसकुराहट  में अपने गम को छुपाता हूँ 

देखता हूँ  jindagi   तू मुझे  कैसे हराती है 
jindgi जाने मुझे क्या सीखाना chahti  है
fir  उन्ही वीरानो मे मुझे  क्यूँ ले जाना चाहती है
      fir  उन्ही वीरानो मे मुझे  क्यूँ ले जाना चाहती है
अजीत  (तमन्ना ) कुमार singh

No comments: