Saturday, November 27, 2010

मेरा दुःख कुछ भी नहीं ......उसके आगे.....

    मेरा दुःख  कुछ भी नहीं ......उसके आगे.....

रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //
 कभी सोचता,कभी खोजता, दुनीया की भीड़ में
खुद को dundhta

सबसे milta हूँ मैं  सबको गले लगाता हूँ मैं
सब कुछ है पर खुद को सबसे  अकेला पाता हूँ मैं

रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //

सब  मुझसे कहते हैं,तुम बहुत मुस्कुराते हो
कोई तोह पूंछे इसमें  kitne गम दफनाते हो
kya kisi   मुस्कान के पीछे  इतना गम होता है
चुप चुप सबकुछ सहता है पर मन ही मन रोता है
सबकुछ होने पर भी ये मन kyunn रोता है
क्या सबकुछ milne वालों कोई भी कोई गम होता है
उठते बैठते जागते सोते यही सोचता हूँ मैं


रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //

पर  मैं तोह कुछ भी नहीं ये हरदम मुझको लगता है/
जब इक छोटा सा  झोले वाला बच्चा मुझको  dikhta है
गुटके,बीडी sigret ले लो हर बार  yahhi वो कहता है
हर इक गुटके के पाउच में  बस उसका बचपन bikata है//
क्या उसकी दुनीया होगी क्या उसका जीवन होगा
polic ने उसको पकड़ liya तो आज उसका क्या होगा
collage की और आते आते यही सोचता हूँ मैं 

रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //

वो बच्च मुझसे   े कहता है भइया गुटके ले लो / 
एक  के बदले आप तो  एक free मैं ले लो //
मै गुटके नहीं खाता ये मैं उससे कहता हूँ /
दुःख तो होता है पर मै चुप चुप सा रहता  हूँ //
दुःख थे इतने उसको पर आँखों मे न नमी थी 
सुन्दर है चेहरा बस कपड़ों की कमी थी //
क्यूँ मैं कुछ नहीं कर पाता चुप क्यूँ रहता हूँ मैं 
collage की और आते आते यही सोचता हूँ मैं 

रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //

इक  din मुझको mile इक सज्जन उन्नने मुझे बताया 
इसकी माँ ने भी एसे ही train मैं जीवन bitaya 
पापा के गुजरे तोह जाने सालों बीत चुके हैं 
मम्मी के भी लगता है din पूरे हो चुके हैं 
कई dino से इसकी माँ बीमार पड़ गई है 
ये इसकी मजबूरी है या भूख बढ गई है 
ये इक छोटा सा बच्चा जाने  कीतने गम सहता है
सब  कुछ सहता है पर dinbhar हँसता रहता है
 मैं भी न जाने पल पल क्या dundhta रहता हूँ 
सब कुछ है fir भी मैं क्यूँ चुप चुप सा रहता हूँ 

जहाँ सीखने को milta है , वहीँ सीखता हु मैं 
रोज सवेरे जब collage की और दौड़ लगाता हूँ मैं/
सुबह सुबह की train से जब collage जाता हूँ मैं //
                                                               :अजीत (तमन्ना) कुमार singh

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